कई बार समझ नहीं आता कि ज़िन्दगी में आप जिन चीज़ो को कुछ समय तक बहुत महत्वपूर्ण मानते हो, फिर बाद में उनकी ज़रूरत ही इतनी नहीं लगती, आप उन्हें करते तो जाते हो, पर फिर लगता है आप ज़िन्दगी से कुछ और ही चाहते हो..
जैसे कभी कभी मेरी इच्छा होती है कि दिन प्रतिदिन की "लाइफ" से "ब्रेक" लेकर अपने मन के कहीं कोने में दबे कुछ खास एवं असंभव से लगने वाले सपनो को समय दू, जैसे एक यात्री बन जाऊं और विदेश न सही, पर अपने देश में ही अपने हिसाब से घूमू.. एक घुमक्कड़ की तरह! अपने हिसाब से, अपने आस पास की दुनिया को अनुभव करूँ..
पर्यटक तो बहुत पहले से रहा हूँ और पसंद भी करता हूँ जितना पर्यटन मैं कर पता हूँ.. पर खासकर हम भारतीयों की पर्यटन गतिविधियाँ बहुत ही तयशुदा होती है, जितना "टूरिज्म-बुक" में लिखा होता वह सब हम अपने यात्रा में सिर्फ "देख" लेना चाहते है, जैसे हर पर्यटक स्थल में जाकर हाज़िरी लगाना हो..(एक यात्रा में सिर्फ चुनिंदा चीज़ो का दिल से अनुभव लेना, हम भारतीय आमतौर पर नहीं करते), और कहीं न कहीं मेरी अब तक की यात्राओं का यही स्वरूप रहा है.....
अभी तक सारा घूमना फिरना परिवार एवं मित्रों के साथ रहा है, और उनका ही अपना मज़ा रहा है... पर बहुत दिनों से दिमाग में अकेले कोई जगह जा के घूमने का विचार है..
"घुमक्कड़" बनने के विचार के साथ दो और शंकाएं मन में आती है -
- या तो यह विचार इस लिए आते है कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की बोरियत से बचने के लिए दिमाग आपने आप को फिर से ताज़ा करने लिए ही ऐसे विचारो को उभरता हो
- अथवा फिर क्या मैं ऐसा कभी कर पाउँगा, (यह "कम्फर्ट जोन" से निकलने वाली बात है)
वैसे तो अध्यात्म की कृपा से मैं अब वर्तमान को लेकर ज्यादा ही सजग हो गया हूँ.. तो इन शंकाओं में न पड़, अगर मेरे विचारो में थोड़ी भी ईमानदारी है, तो फिर, कभी इनको संभव करने के लिए निकल जाऊंगा...!
देखो क्या होता है आगे!!
जैसे कभी कभी मेरी इच्छा होती है कि दिन प्रतिदिन की "लाइफ" से "ब्रेक" लेकर अपने मन के कहीं कोने में दबे कुछ खास एवं असंभव से लगने वाले सपनो को समय दू, जैसे एक यात्री बन जाऊं और विदेश न सही, पर अपने देश में ही अपने हिसाब से घूमू.. एक घुमक्कड़ की तरह! अपने हिसाब से, अपने आस पास की दुनिया को अनुभव करूँ..
पर्यटक तो बहुत पहले से रहा हूँ और पसंद भी करता हूँ जितना पर्यटन मैं कर पता हूँ.. पर खासकर हम भारतीयों की पर्यटन गतिविधियाँ बहुत ही तयशुदा होती है, जितना "टूरिज्म-बुक" में लिखा होता वह सब हम अपने यात्रा में सिर्फ "देख" लेना चाहते है, जैसे हर पर्यटक स्थल में जाकर हाज़िरी लगाना हो..(एक यात्रा में सिर्फ चुनिंदा चीज़ो का दिल से अनुभव लेना, हम भारतीय आमतौर पर नहीं करते), और कहीं न कहीं मेरी अब तक की यात्राओं का यही स्वरूप रहा है.....
अभी तक सारा घूमना फिरना परिवार एवं मित्रों के साथ रहा है, और उनका ही अपना मज़ा रहा है... पर बहुत दिनों से दिमाग में अकेले कोई जगह जा के घूमने का विचार है..
"घुमक्कड़" बनने के विचार के साथ दो और शंकाएं मन में आती है -
- या तो यह विचार इस लिए आते है कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की बोरियत से बचने के लिए दिमाग आपने आप को फिर से ताज़ा करने लिए ही ऐसे विचारो को उभरता हो
- अथवा फिर क्या मैं ऐसा कभी कर पाउँगा, (यह "कम्फर्ट जोन" से निकलने वाली बात है)
वैसे तो अध्यात्म की कृपा से मैं अब वर्तमान को लेकर ज्यादा ही सजग हो गया हूँ.. तो इन शंकाओं में न पड़, अगर मेरे विचारो में थोड़ी भी ईमानदारी है, तो फिर, कभी इनको संभव करने के लिए निकल जाऊंगा...!
देखो क्या होता है आगे!!

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