प्रशांत ने जब पहली बार जयपुर में काम करना शुरू किया था, उसके पहले तक उसे लगता था कि वह स्कूल या कॉलेज में दोस्त बनाने वाले दौर को कब का पार कर चुका है और अब शायद ही नए लोगो से वह रिश्ता बन पाए। पर उसे कहाँ पता था कि चीज़े तब और अच्छे से होती है जब आप उसे अपने संकीर्ण नजरिये से देखने की कोशिश न करें।
और जयपुर में ही नए लोगो के उम्र और विचारो की विभिन्नताओं और विशेषताओं ने प्रशांत को खुद कितने नए मजेदार अनुभवों से मिलवाया है।
"कहाँ खो गए?" प्रशांत के दोस्त के इन शब्दों ने विचारो में डूबे प्रशांत को एकाएक चौंका सा दिया।
"कुछ नहीं, बस ऐसे ही कुछ सोच रहा था!" मुस्कुराते हुए प्रशांत ने जवाब दिया और दोनों फिर से कॉफ़ी के प्यालो के साथ बतियाने में लग गए।

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