बात करता हूँ कुछ उन बातों या सवालो पर जिन पर मैं कुछ दिनों से गौर कर रहा था।
- क्यों हम न चाहते हुए भी नेगेटिव बातो पर अधिक ध्यान देते है या उन पर ज्यादा अटकते है? यह हैरानी कि बात नही, कि ज्यादातर सेल्फ-हेल्प वीडियो / बुक्स लोगो को सकरात्मक जीवन या नजरिया सीखाने पर ही होती है तो भी हम नेगेटिव रहने मेँ ज्यादा सहज है।
- जब हम जानते है कि हर एक इंसान दूसरे से अलग है (और कोई किसी से बेहतर या कम नही है) तो क्यों हम लोग श्रेष्ठता या हीन की भावना से पीड़ित हो जाते है? क्या दिक्कत है लोगो को अपने आप को स्वीकार करने में और अपने को ही अपने से हर दिन बेहतर बनाने में।
- आपका मन एक एक बहुत ही शानदार चीज़ है। इसकी विचारो की शक्ति का सही उपयोग जितना फायदेमंद है, उतना ही घातक है इसी शक्ति का दुरपयोग। इस दुनिया में जो भी अपने-अपने क्षेत्र में सफल हुआ है उसमे उसके मन का साथ अहम् रहा है। तो भी क्यों ज्यादातर समय हमारा ही मन हमारा नही होता है?
- एक और बात!! "नार्मल" और "परफेक्ट" की सही परिभाषा क्या है? क्या यह दोनों शब्द ही काल्पनिक आदर्श दुनिया (यूटोपियन) से संबंध नही रखते है? क्या आप बता सकते है कि इस दुनिया मेँ कौन ऐबनार्मल है या इमपरफेक्ट और कौन नही?
चलो, आज 2019 का पहला ब्लॉग लिख ही दिया.. उम्मीद है अपने से ही थोड़ी सी, कि अब ब्लॉगिंग कि आदत पर थोड़ा ज्यादा ध्यान दूंगा।

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