Saturday, December 13, 2014

एक खास सपना और कुछ असमंजस

कई बार समझ नहीं आता कि ज़िन्दगी में आप जिन चीज़ो को कुछ समय तक बहुत महत्वपूर्ण मानते हो, फिर बाद में उनकी ज़रूरत ही इतनी नहीं लगती, आप उन्हें करते तो जाते हो, पर फिर लगता है आप ज़िन्दगी से कुछ और ही चाहते हो..

जैसे कभी कभी मेरी इच्छा होती है कि दिन प्रतिदिन की "लाइफ" से "ब्रेक" लेकर अपने मन के कहीं कोने में दबे कुछ खास एवं असंभव से लगने वाले सपनो को समय दू, जैसे एक यात्री बन जाऊं और विदेश न सही, पर अपने देश में ही अपने हिसाब से घूमू.. एक घुमक्कड़ की तरह! अपने हिसाब से, अपने आस पास की दुनिया को अनुभव करूँ..


पर्यटक तो बहुत पहले से रहा हूँ और पसंद भी करता हूँ जितना पर्यटन मैं कर पता हूँ.. पर खासकर हम भारतीयों की पर्यटन गतिविधियाँ बहुत ही तयशुदा होती है, जितना "टूरिज्म-बुक" में लिखा होता वह सब हम अपने यात्रा में सिर्फ "देख" लेना चाहते है, जैसे हर पर्यटक स्थल में जाकर हाज़िरी लगाना हो..(एक यात्रा में सिर्फ चुनिंदा चीज़ो का दिल से अनुभव लेना, हम भारतीय आमतौर पर नहीं करते), और कहीं न कहीं मेरी अब तक की यात्राओं का यही स्वरूप रहा है.....

अभी तक सारा घूमना फिरना परिवार एवं मित्रों के साथ रहा है, और उनका ही अपना मज़ा रहा है... पर बहुत दिनों से दिमाग में अकेले कोई जगह जा के घूमने का विचार है..

"घुमक्कड़" बनने के विचार के साथ दो और शंकाएं मन में आती है -

- या तो यह विचार इस लिए आते है कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की बोरियत से बचने के लिए दिमाग आपने आप को फिर से ताज़ा करने लिए ही ऐसे विचारो को उभरता हो

- अथवा फिर क्या मैं ऐसा कभी कर पाउँगा, (यह "कम्फर्ट जोन" से निकलने वाली बात है)


वैसे तो अध्यात्म की कृपा से मैं अब वर्तमान को लेकर ज्यादा ही सजग हो गया हूँ.. तो इन शंकाओं में न पड़, अगर मेरे विचारो में थोड़ी भी ईमानदारी है, तो फिर, कभी इनको संभव करने के लिए निकल जाऊंगा...!
देखो क्या होता है आगे!! 

Tuesday, December 9, 2014

कुछ वृत्रांत, कुछ बातें



तो चलो मैनें हिंदी ब्लॉग के नाम पर कुछ लिखना तो शुरू किया.. यह ब्लॉग लिखते समय में दिल्ली - हबीबगंज शताब्दी ट्रैन से झाँसी से भोपाल आ रहा हूँ.. ट्रैन ललितपुर पहुँचने वाली है.. इस बार छत्तरपुर की यात्रा में सोचा ही था कि लौटते समय ट्रैन में कुछ लिखूंगा, कब से सोच रहा हूँ कि अब कुछ लिखूंगा पर कोई माहौल ही नहीं बन पा रहा था, चलो इस बार तो कुछ शुरुआत हुई..

वैसे ट्रैन यात्रा सुविधाजनक ही चल रही है और कुछ लोग है अभी जिन पर कुछ लिख सकता हूँ पर चलो छोडो, छत्तरपुर यात्रा की ही बात करते है.. छत्तरपुर हो या कोई अन्य शहर, जहाँ भी मैं रह चूका हूँ, इन सब शहरों का मेरे व्यक्तिव विकास में योगदान रहा है.. इनमे से कोई एक शहर को ही पूरा श्रेय नहीं दिया जा सकता है, यहाँ तक भोपाल को भी नहीं, जहाँ से थोड़ा अधिक ही जुड़ाव रहा है..

वैसे अभी यहाँ तक लिखने से पहले मुझे ललितपुर स्टेशन के बाद दूसरी खाली चेयरसीट में बैठने को मिल गई, यहाँ लैपटॉप चार्ज करने के लिए स्विच भी पास है दूसरा यहाँ विंडो सीट भी है!!

लो जी ट्रैन वाले खाना भी परोसने लगे है... बाकी ब्लॉग, खाने के बाद जारी रखूँगा..

खाना हो गया.. और ट्रैन अपनी चिर-परिचित तीव्रगति से भोपाल की और चली जा रही है.. शताब्दी ट्रैन से मेरा लगाव कुछ अलग ही रहा है. ग्वालियर में पर्यटन की पढाई की दौरान लगभग इसी ट्रैन से भोपाल आता जाता रहता था.. इसी ट्रैन के नए डब्बे पूरे यूरोपियन शैली के है जिनमे खिड़कियाँ काफी बड़ी होती है और आपको बाहर का बेहतरीन नज़ारा दिखाई देता है.. इसलिए इसकी सीट में आराम से बैठकर बाहर देखने का अनुभव भी कुछ और है और कितनी बार ही मैं पहले भी इसी ट्रैन में यात्रा के दौरान इसी अनुभव के साथ आत्म-चिंतन करता आया हूँ..


चलो बातें तो है खूब सारी, पर बाकी फिर कभी... अब तो भोपाल पहुँचने का इंतज़ार है, और फिर रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त होने का!!

आज लग रहा है कि मैं अपने ब्लॉग को अपडेट कर पाउँगा, इसकी के साथ इस पोस्ट को यहीं खत्म करता हूँ..

Monday, September 15, 2014

Back With A Bang

Here I am... Back on this blog after literally two years.. God knows what I was upto till now.. But the fact I ignored my blogpage.. But hopeful not any more..

I'm seriously thinking to make it proper & regular once again... And instead of making different blogs for my travelogues & hindi stories, I should rather include them in this blog only which is usually meant for the random things.

So, lets roll!!! ;)