Sunday, May 10, 2015

नये दौर को लेकर कुछ नईं बातें



आख़िरकार लगभग ढाई महीने के बाद मुझे कुछ लिखने का समय मिला। वैसे पहले भी कई बार अपने ब्लॉग के बीच में मैने लम्बा अंतराल लिया है, पर इस बार तो लिखने के लिए बहुत कुछ है, खासकर इंदौर में शुरू हुई मेरे नये दौर के बारे में..

काम की व्यस्तता, समय की अनुपलब्धता अथवा नई  ज़िन्दगी में कुछ ज्यादा ही खोया होना.. पता नहीं क्या कारण रहा इस अंतराल का, पर इंदौर आना मेरी ज़िन्दगी के कुछ बेहतरीन निर्णयों में शामिल हो गया है। नये लोगो  से मिलना, ऑफिस में रहकर काम करना, नई चुनौतियों का सामना करना.. कितना कुछ सीखने को मिल रहा है, अपने कार्यक्षेत्र को लेकर, अपनी ज़िन्दगी की लेकर, अपनी भावनात्मक प्रक्रिया को लेकर।

बेशक़ मैं अपने उस दोस्त का शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने शुरुआत से इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पर साथ ही साथ मुझे अपने आप पर भी थोड़ा गर्व तो है कि मैने भी अपने "कम्फर्ट ज़ोन" से निकलने की हिम्मत दिखाई। यह इस लिए भी हुआ, क्योंकि अब मैं ज़िन्दगी में अपने हिसाब से कुछ करना चाहता था और अब यह अपने हिसाब से जीने की शुरुआत है।

भगवान महाकाल की कृपा है कि इंदौर में बदलाव की प्रक्रिया पूरी तरह से सुगम रही और एक ही जगह में सब मिल गया। जहाँ तक ऑफिस में रहकर काम करने की बात है तो वह अनुभव इतना अच्छा है कि मुझे रविवार के आने पर कोफ़्त होती है क्योंकि यही दिन उबा देने वाला होता है।

बेहतरीन लोगो के साथ काम करना, समय समय पर मनोरंजन के लिए कुछ पल निकाल लेना इत्यादि बातों ने यहाँ के पूरे माहोल को खुशनुमा बना रखा है। इन सबके साथ मैने जैसे सोचा था वैसे ही स्वास्थ्य के लिए भी समय निकाला है। तो दिन भर का एक संतुलित कार्यक्रम है जिसमे सब शामिल है।


देर से ही सही, पर अब मैं अपने दम से जीना सीख रहा हूँ.. अकेले रहना, अपने पैसे खुद कमाना और अपने हिसाब से सब करना, यह दौर, सब को अपनी ज़िन्दगी में एक बार तो ज़रूर जीना चाहिए.. क्योंकि यही समय आपको आपके बारे में बहुत कुछ सीखा जाता है।

जहाँ तक मेरी बात है, यह समय धीरे धीरे ही सही पर मुझे अपनी ज़िन्दगी खुद के हिसाब से (न कि अप्रासंगिक प्रारूपों के अनुसार) जीने के लिए और प्रेरित कर रहा है। ऐसी ज़िन्दगी, जो मेरी खुद की बनाई हुई होगी, जिसमे दखल होगा सिर्फ मेरे खुद के निर्णयों का एवं मेरे खास लोगो का।

बाकी यह दौर मुझे पर्यटक के बजाय यात्री बनने के लिए भी जरुरी प्रेरणा एवं हिम्मत दे रहा है। कहाँ कुछ समय पहले तक, मैं दमन जाने का सिर्फ सोचता ही रह गया, पर अब कुछेक महीने के बाद मैं अपने आप से अडालज (गुजरात) में एक अद्यात्मिक आश्रय में सप्ताहांत बिताने जाऊंगा।

चीज़े कितनी कुछ बदल चुकी है और वह भी वैसे ही, जैसा मैं चाहता था।
बाकी अब मेरा पूरा ध्यान अपने संगठन को आगे बढ़ाने में एवं अपने कार्य में बेहतर बनने में रहेगा।



और हाँ, कुछ दिनों बाद, फिर से एक पर्यटक के रूप में ही सही, मैं सिक्किम जा रहा हूँ। पर उसके बारे में बाद  में...

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