Tuesday, September 3, 2013

इमारतों का व्यक्तिव

बहुमंजिल इमारतों की भी अपनी दुनिया है| इनमे कितनी जिंदगियाँ बन-सँवर रही है, शायद ही कोई उसका अनुमान लगा सकता है| हरेक अपने अपने अनुभव से गुज़र रहे है, हरेक अपना छाप छोड़ने मे लगा है|

उन्ही सब इमारतों मे से एक में, मैं अपने पलों की जी रहा हूँ| अपने सामने की खिड़की से जहाँ तक नज़र जा रही है, वहाँ तक इमारतों की कतार है| इनका भी अपना एक सौन्दर्य है और शायद यह सतत कतार, ज़िंदगी के सतत होने का भी आभास देती है| रहवासियो के अनजाने स्वर, कहीं होते मरम्मत कार्य की आवाज़, पंछियों का कलरव और दूर से आती सड़क पर से गाड़ियो का शोर, यह सब मिलकर, लगता है, एक संगीत को जन्म देती है, इमारतों का संगीत!

यही सब महसूस करते हुये मेरा ध्यान इस तथ्य पर चला जाता है कि बाहर से शांत दिखती इन इमारतों ने कितने संघर्षो को छिपा सा रखा है| इन सब के भीतर कितने लोग कितनी कहानियों को जन्म दे रहे होंगे| हर कोई अपनी ज़िंदगी मे इतना रमा है कि शायद ही कभी उसने कुछ पल अपने माहौल को महसूस करने के लिए दिये हो|

जिस तरह इमारतों को एक दूसरे से ऊपर बनाने की होड़ रहती है, उसी तरह इंसान भी ऊपर उठने को होड़ में लगा है पर जिस तरह एक मजबूत नींव इमारत को आधार प्रदान करती है वैसे ही इंसानों का आधार उनका व्यक्तिव है जो उनके आदतों और अनुभवों से बनता है, पर शायद उसी के विकास के लिए अब समय नहीं है|

1 comment:

ERA TIWARI said...

Very Well written Vipul! So true... No time for character in this materialistic world!