न चाहते हुए भी फिर से ब्लॉग अपडेट करने में साल भर से ज़्यादा लग गए।
कितनी चीज़े नई हुई, कितना कुछ बदला है, बहुत कुछ बोलने लिखने को है।
जब आप अकेले बाहर रहते हो, तब कई बाहरी फैक्टर्स आपके संस्कारो और अपने सोचने के तरीके को बहुत प्रभावित करते है।
जब तक मैं अपने घर में रहा तो कई चीज़ों के लेकर मुझे लगता था कि मेरी राय बहुत साफ़ है, कि मुझे क्या चाहिए, क्या नहीं। पर जैसे ही मैं कुछ महीनों से अकेले बाहर रहना शुरू किया। तब बहुत ही आश्चर्यजनक तरीके से कई बाहरी बातों ने मेरे सोचने के तरीको को प्रभावित करने की कोशिश की। कई ऐसी चीज़े जो मेरी ज़िन्दगी में मायने नहीं रखती थी, उनके लिए भी एक अज़ीब सा आकर्षण होने लगा। और इन सब बातों से मन में काफी समय तक द्वन्द रहा। इन सबका एक कारण यह भी था कि अपने घर में आप एक परिचित माहौल में रहते हो और बाहर निकलते ही दूसरी बाहरी बातों के आकर्षण को आप अपने आसपास पाने लगते हो।
ऐसा नहीं है कि जैसा मैं था, मैं वैसा ही रहा, कुछ बातों को लेकर मेरी सोच और साफ़ हुई और कुछ बातों के प्रति मेरी सोच वैसे की वैसे ही रही.
पर कई बार यह बाहरी बातों का आकर्षण ही लोगो से कुछ काम न चाहते हुए ही करवा देता है और वह फिर अपने आप को ऐसी जगह पाते है कि जहाँ वो न तो उगल सकते है, न निगल।
लाइफ कहो या ज़िन्दगी.. परिस्थियाँ पहले देती है और सीख बाद।
